परंतु क्या वाकई ऐसा है? बिलकुल नहीं, यदि आप समझ सकें कि क्षमा एक ऐसा दर्शन है जो हमारे दिमाग में बार-बार आनेवाली प्रतिशोध की भावना से हमें सुरक्षित करने के लिए बनाया गया है। यह दर्शन हमें नकारात्मक विचारों के प्रभाव से उबारने के लिए तैयार किया गया है। हम यह नहीं समझ पाते कि हमारे विचार हमारे कार्यों, हमारे जीवन और इस प्रकार हमारी नियति को प्रभावित करते हैं।
जब हम किसी ऐसे व्यक्ति को क्षमा नहीं कर पाते, जिसने हमारी भावनाओं को आहत किया हो, तो हम दुश्मनी पाल लेते हैं और उससे बदला लेने की ताक में रहते हैं। यह उसे पूरी तरह प्रतिशोध की भावना में बदल देता है। यदि हमारे पास वह प्रतिशोध लेने के माध्यम हों, तो हम मानते हैं, जो कि गलत है, कि उससे हमारे मन को शांति मिलेगी।
लेकिन यह धारणा पूरी तरह गलत है, क्योंकि प्रतिशोध कभी पूरा नहीं होता, वह एक दुश्चक्र है।
प्रतिशोध फिर लौटकर आता है जब दूसरा पक्ष उसका जवाब देता है और जल्दी ही स्थितियाँ नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, फिर किसी को याद नहीं रहता कि यह सब शुरू कैसे हुआ था। खानदानी शत्रुता इसी तरह शुरू होती है, जो पीढिय़ों तक चलती रहती है और कोई चाहने पर भी इस पागलपन से बाहर नहीं निकल पाता।
यदि कोई बदला लेने की स्थिति में न हो, तो क्या होता है? दबे हुए गुस्से की भावना हमारे अंदर सुलगती रहती है और एक विनाशकारी एसिड की तरह हमें अंदर-ही-अंदर खाती रहती है। वह हमें चिड़चिड़ा और नाखुश देती है। यह निश्चित रूप से कोई अच्छी मानसिक स्थिति नहीं है।
इसलिए इसका सबसे बढिय़ा हल — और आगे की ओर बढ़ने का एकमात्र तरीका - सच्चे दिल से उन लोगों को माफ कर देना है, जिन्होंने हमारे साथ बुरा व्यवहार किया। यदि हम निष्पक्ष रूप से देखें तो ऐसी प्रवृत्ति हमारे अपने हित में है और यह हमारी मानसिक शांति में इजाफा करती है।
जब हम सच्चे दिल से माफ करने के बारे में बात करते हैं , तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने घरों के बाहर सबके देखने के लिए क्षमा के अपने सिद्धांत की तख्ती लटका दें या अपने इस व्यवहार को उन लोगों के सामने स्पष्ट करें,
जिन्होंने हमें नुकसान पहुँचाया है। आज की निर्मम और मुश्किल दुनिया में यह व्यवहार हमें आसान शिकार बना देगा। बल्कि इसका मतलब यह है कि हम अपने दिल में उन्हें माफ कर दें, ताकि सारी कड़वाहट खत्म हो जाए और हम अपने जीवन की एक अशांत घटना का अध्याय समाप्त कर सकें।
सच्चे दिल से क्षमा करने और स्थिति से समझौता करने से ही हम अधिक समृद्ध और अर्थपूर्ण जीवन बिता सकते हैं। या फिर हम हमेशा अतीत के अवांछित बोझ को ढोते रहेंगे।
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