यहाँ 'गुरु' का अर्थ विद्या पढ़ानेवाले स्कूल या कॉलेज के प्राध्यापक से नहीं है, क्योंकि वे तो केवल शिक्षक हैं, शुद्ध रूप से 'गुरु' नहीं । गुरु का अर्थ उस आध्यात्मिक व्यक्ति विशेष से है जो ब्रह्म को जानता है और हमारी आध्यात्मिक उन्नति करा सकता है। इसलिए केवल भगवा वस्त्र पहननेवालों को या लंबी दाढ़ी रखनेवालों को गुरु की संज्ञा नहीं दे सकते, उन्हें हम केवल आध्यात्मिक बातें करनेवाले बुद्धिजीवी तो कह सकते हैं, पर 'गुरु' नहीं । भारतीय दर्शन के अनुसार, सच तो यह है कि 'गुरु' को ढूँढ़ा नहीं जाता, अपितु जब आप शिष्य बनने योग्य हो जाएँगे और अध्यात्म की यात्रा के लिए तैयार होंगे, तब गुरु आपको ढूँढ़ता हुआ स्वयं आपने पास आ जाएगा। ऐसा होने के लिए कई जन्मों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
गुरु ढूँढ़ने से नहीं मिलते, कारण गुरुतत्त्व सूक्ष्मतम है । अध्यात्म में शिष्य गुरु को धारण नहीं करता, अपितु गुरु ही शिष्य को चुनते हैं, आगे का मार्ग बताते हैं । भविष्य में कौन उनका शिष्य होगा, यह एक सच्चे गुरु को पहले से ही ज्ञात होता है । गुरुकृपा बिना गुरुप्राप्ति नहीं होती है । एक आश्चर्य की बात यह है कि आज तीन युगों की तुलना में कलयुग में गुरुप्राप्ति व गुरुकृपा प्राप्त करना कठिन नही है। बस आप में इस प्राप्ति के लिए सच्ची लगन होनी चाहिए। गुरु एक दिन आपके उद्धार के लिए आपके द्वार पर होंगे
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