सिद्धि मिले जो हरि गुण गाता।।
जन्मजन्मअभ्यास,सिद्धियाँ तब हैं आतीं। बिनाकृपाकी सिद्धि, हृदयअज्ञान बढ़ातीं।
अणिमा छोटाकरे, बढ़ाती वपुको महिमा। लघुकरती लघिमा तो भारबढ़ाती गरिमा। सिद्धि मिले तो मानव देव तुल्य हो जाता। अष्टसिद्धि नवनिधिके बजरंगी तुम दाता।
प्राप्तिदिलाए सबसुख निजइच्छासे पाऐं। प्रभुइच्छा ही कर्म,यहीप्राकाम्य बताऐं ।। वशमें होता जग वशित्वकी सिद्धि पाए। है ईशत्व मनुज को ईश चरण तक लाए।।
सकलकाज होसिद्ध आपकीदया कृपासे। तीनलोक हैंविनत आपकी गुणप्रतिभा से नवनिधिके तुमदाता हेअतुलित बलशाली भक्तोंकी पलमें भर देते झोलीखाली।।
हेहनुमन्त पवनसुत प्रभु करुणाके सागर। तीनलोकमें दिव्यकीर्तियश रहाउजागर।। आंजनेयकाध्यान सकलसंपदा दिलाता ।अष्टसिद्धिके आप पवननन्दन ही दाता ।
असवर दीन्ह जानकी माता ।।
सियबर को तुम ही सुखदाता।।
भूमिसुताको दशमुखने ले कहीं छुपाया।कहाँढूँढ़नेजाँय किसी की समझन आया। सागरलाँघ नगरलंकामें हुआ प्रवेशा। निशाचरोंसे घिरनेका हर तरफ अंदेशा।।
लंकामें जुड़गया विभीषणजी से नाता । निर्भयविचरणका वरदेतीं तुमको माता।। ध्वस्तलंकिनीको करके लंका में आए। दुर्जनदल में रामायुध के दरशन पाए।।
वनअशोकमें फलसे लदे वृक्ष जब पाए । भूखलगीतो मधुरफलोंको तुम ललचाए।। कहा सियाने जाओ मनचाहे फल खाओ। थकेहुए हो जाकर अपनीभूख मिटाओ।।
माँ सीताको रघुनायककी खबर सुनाई। विरह व्यथा में कितने व्याकुल हैंरघुराई।।मनप्रसन्न मातासे यहवर तुमने पाया। सदामिले प्रभुसेवाका अवसर मन भाया।
स्वामीके हित कौनसहज यहकष्ट उठाता। राम प्रेम आशीष देरहीं तुमको माता ।।
(क्रमश:)
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