शनिवार, 3 अगस्त 2024

प्राचीन काल में पुरुषों के दोनों कानों को छेदा जाताथा,क्यों ?

हमारे प्राचीन ऋषियों-मुनियों को मानव शरीर की आंतरिक रचना का पूरा व गहरा ज्ञान था। आयु बढ़ने पर प्रायः शौच करते समय जोर लगाने से मूत्र के साथ अज्ञातरूप से वीर्य स्खलित होने लगता है और यदि इस पर ध्यान न दिया जाए तो यह एक भयंकर रोग का रूप धारण कर सकता है। परंतु यदि कानों को बिंधवा लिया जाए तो वीर्य स्खलित होने का भय नहीं रहता । यह एक प्रकार का उपचार है। प्राचीन काल में कानों का या यज्ञोपवीत के समय छेदना किया जाता था, ताकि कानों की नाड़ियाँ जाग्रत् होकर संचेष्ट हो जाएँ। इस प्रकार ऋषि-मुनि सम्मिलित रूप से अपना वीर्य संरक्षण करते थे और साथ ही यज्ञोपवीत की पवित्रता भी बनाए रखते थे।

कानों के भेदन से व्यक्ति डायबिटीज, प्रमेह एवं मल-मूत्र संबंधित अनेक बीमारियों से बच सकता है । आजकल तो कान बिंधवाना और उनमें सुंदर लौंग पहनना पुरुषों के लिए भी एक फैशन बन गया है। उनका यह फैशन अनजाने में उनके लिए कितना हितकर है, वे यह नहीं जानते ।

आपने कई लोगों को लघुशंका करते समय कान पर जनेऊ लपेटे देखा होगा, उनकी इस मान्यता के पीछे भी इसी प्रकार का एक वैज्ञानिक सत्य है । आयुर्वेद के अनुसार 'लोहितिका' नामक एक विशेष नाड़ी मनुष्य के दाहिने कान से होकर उसके मल-मूत्र द्वार पर पहुँचती है। यदि इस कान की नाड़ी को पीछे से थोड़ा सा हाथ से दबाएँ तो व्यक्ति का मूत्रद्वार स्वत: ही पूर्णरूप से खुल जाएगा और उसके ब्लैडर में जितना भी मूत्र होगा, वह सारा बाहर निकल जाएगा। जमीन पर बैठकर लघुशंका करने से भी पूरा मूत्र बाहर निकलने में सहायता होती है। खड़े होकर लघुशंका करने से सारा मूत्र सरलता से बाहर नहीं निकलता।

शरीर की इस नाड़ी का संबंध अंडकोष से भी है। इस सत्य को स्वीकारते हुए आजकल डॉक्टर हर्निया जैसी बीमारी की रोकथाम के लिए इस नाड़ी को छेद देते हैं । इसका एक और लाभ यह है कि ऐसा करने से व्यक्ति का मूत्र शरीर के विषैले अंश लेकर सरलता से अंतिम बूँद तक उतर जाता है और उसे मूत्र संबंधी कोई रोग नहीं होता । आधुनिक डॉक्टर जो अब कर रहे हैं, हमारे ऋषि-मुनियों ने इन उपायों को हजारों वर्ष पूर्व जानकर मनुष्य के जीवन में सम्मिलित कर लिया था ।

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