जो न सजग हो जाय।
खड़ी धार पर जानिए,
करतब मूढ़ दिखाय ।।
बुरा तब मिले नतीजा,
जहर यह तू ही पी जा।।
67.मानव ही करता प्रथम,
संस्कृति का निर्माण ।
फिर निज जीवन मूर्ति के,
वह गढ़ता पाषाण ।।
जन्म निज हाथ सँवारे,
तोड़ता वही सितारे।।
68.बुद्धिमान ही समझते,
गुणियों के उद्गार ।
बहरे श्रोता के लिये,
राग रंग बेकार ।।
गुणी प्रतिभा पहिचाने,
मूढ़ क्या नवरस जाने ।।
69.मौलिकता होती सदा,
प्रतिभा की पहिचान।
नई राह जो खोजता,
वो है गुणी महान ।।
न फूटे ढोल बजाता,
सदा नव सृजन दिखाता।।
70.जीवन में उत्साह हो,
बहु रहस्य भरपूर ।
पल पल सजे उमंग तो,
नाचे हृदय मयूर ।।
जिन्दगी की तह खोलो,
खुशी में चित्त भिगो लो।।
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