मिला सहज अधिकार ।
किन्तु उचित है या नहीं,
यही सत्य आधार ।।
कर्म है प्रतिपल करना,
नियति की फिक्र न रखना ।।
72.श्रेष्ठ ग्रन्थ होते कि ज्यों,
जादू का कालीन।
जो दिखलाते जीव को,
जीवन नित्य नवीन ।।
ग्रन्थ हैं अमृतधारा,
भूमि पर स्वर्ग उतारा।।
73.जीवन के जिस द्वार से,
मिलता नहीं प्रवेश ।
ग्रंथ खोलते द्वार वह,
करें ज्ञान उन्मेष ।।
पुस्तकें मित्र हमारी,
भाव की राह सँवारी ।।
74.चिन्ताऐं सिर पर लिये
जो चाहे विश्राम ।
गठरी बाँधे पीठ पर,
चाह रहा आराम।।
पीठ का भार उतारो,
शांति की नींद सम्हारो।।
75.मौन बिन्दु होते निजी,
दो मित्रों के बीच।
बिन बोले ही चित्त को,
दें मधुरस से सींच।।
बोलना नहीं जरूरी,
मौन भी पाटे दूरी ।।
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