मंगलवार, 24 सितंबर 2024

जो शत बार पाठ कर कोई, छूटहि बन्ध महा सुख होई

जो शत बार पाठ कर कोई । 

राम चरण रत सेवक होई ।। 

हे सुग्रीव सखा रघुपति के सेवक हो तुम। भक्तराज हे वीरशिरोमणि तुमसर्वोत्तम।। 

कोटि कोटि मुख महिमा गा नहिं सकें तुम्हारी। 

सत्यशीलकी ध्वजा वीरहनुमत गिरिधारी। 

भक्तोंकी कलिकलुष कृपाके जलसे धोई। 

जीवनमुक्ति मिले शतबार पाठ कर कोई। 

शत पारायणकरे भक्तयदि ध्यान लगाके। प्रणत करे वन्दन तेरे मन्दिर में जा के ।। 

पा कर तेरीकृपा मुक्ति बन्धनसे मिलती।सहजरूप से रामभक्ति मानसमें खिलती। 

शतसंकट शतबन्धन मनमें क्रोधकाम के। इनकेरहते हम नकभी हो सकें राम के।। 

शतपारायण मुक्तिदिलाते मनचिन्तन को। इसकारण बजरंगीहोते प्रियजन जन को। 

ज्ञानप्रेम विश्वासशक्ति चिन्तन में जगती। जन्म जन्मतक रामभक्ति फिर मनमें पगती।। 

रामचरण पादुका प्रेमके जलसे धोई। मिले राम पदरति शतबार पाठकर कोई।।

छूटहि बन्ध महा सुख होई।। 

जन मन की कल्मषता धोई ।। 

सुसम्पत्ति दाता हेहनुमत नाम तुम्हारा ।भवसंकट में फँसे दासका आप सहारा ।। 

हे कपि नायक रामदूत बजरंगी प्यारे। रामसिया को बन्धुजनोंसे अधिक दुलारे।। 

भव सागरसे तरे, याद रखता जो कोई। भव बन्धन जब कटें, महासुख मन को होई।। 

अंजनि सुत हनुमन्त सन्त जन को सुखदाई। 

निजमुख से सीतापति ने तव कीरत गाई।। 

कामक्रोध भयबन्धन प्रभु काटोतुम पल में।

तीन लोककी शक्ति समाहित तेरे बलमें। 

लोभ कथाका श्रवण, मोह श्रीरामदरश का। 

वरदहस्त हो शीश, काल कुछकरे न उसका।।

हे हनुमन्त अनन्त दयालु कुशल गुण आगर । 

चरणों में हैं पड़े, नाथ हम तेरे चाकर ।। सुमतिबढ़े सत्संगमिले हमको निजमन में 

रामकृपा संजीवन मिलजाए जीवन में।। रामनाम अनमोल दिव्यनिधि हमने खोई। हनुमत की हो कृपा महासुख पावै सोई।।

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