हम सर्वस सम्मान ।
पा भी लें तो है कहाँ,
रखने का स्थान ।।
मान को हृदय सँजोऐं,
प्रीत की माल पिरोऐं ।।
92.उदासीन होता हृदय
बिगड़ जाय जब नेह।
प्रेम बिना अवरूद्ध हो
नूतन मन का गेह।।
प्रेम से यह जग अपना,
सत्य करता हर सपना ।।
93.घृणा न होती प्रेम का
कभी प्रबल प्रतिरोध ।
चाहे मन के मध्य में,
हो कितने गतिरोध । ।
घृणा से जीत न आए,
प्रेम यह सहज दिलाये ।।
94.करें क्रोध आवेशमें
हम कैसा व्यवहार ।
इससे जग को ज्ञात हो
संस्कृति और परिवार ।।
सीख कैसी है पाई,
क्रोध में पड़े दिखाई।।
95.संकट में मिलता अगर
हमें नेह का हाथ ।
कष्ट घटें खुशियाँ बढ़े,
जग हो अपने साथ ।।
कष्ट कुछ हो जाते कम,
खुशी में बढ़ जाता दम।।
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