मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजे नाथ हृदय में डेरा।।

तुलसी दास सदा हरिचेरा। 

नाम परम सुखदायक तेरा।। 

हनुमतचरित घोर कलियुगमें पार लगावै।

जोध्यावै हनुमान शान्तिसुख सम्पत्ति पावै।। 

सत्यधर्म विश्वासशील का आपखजाना। भवसंकट से हमें वीर हनुमन्त बचाना।। 

रामकटक रक्षाको पूँछ बनावै घेरा। सेवक तुलसीदास चरणरज का है चेरा।। 

जननायक कपिनायक हे हनुमत बलदाई। 

सियाराम कोआप हमेशा है सुखदाई ।। ऋक्षराज ने तुमको जब बल याद कराया। 

सुप्तशक्ति को वीरउक्ति से सहज जगाया।। 

भर छलांग सागरको पार किया था पल में । 

राघवेन्द्र की शक्ति समाहितथी उस बल में।

सुरसा अरु मैनाक बने अवरोध तुम्हारा। मार सिंहिका को लंकिनिको आप पछारा। 

कोटिजन्म गुणगान आपका करनहिं पावे बिना कृपा, मन के, मन में डूबे रह जावें।। 

दिव्यप्रेम मन जगे कटे अज्ञान-अन्धेरा । सदा रहूँ मैं नाथ दिव्य चरणों का चेरा।।

कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।। 

हरो दयानिधि संकट मेरा ।।

मेरामन हनुमत चरणों पर बलि- बलि जाए।

रोम रोग हनुमन्त सदा तेरे गुण गाए।। 

सेवक का यह तुच्छ-हृदय आवास बनाओ। 

अन्त काल तक रहो, यहाँसे कहीं न जाओ ।। 

मारुतिनाम करे तत् क्षण मनमें उजियेरा। सदा करो प्रभु आप, दासके मनमें डेरा।।

कपिलनेत्र हे अमितशक्ति धारक हनुमन्ता तुम्हें समर्पित करदीं अपनी सारी चिन्ता। 

धर्महेतु निज सुखको त्यागा हेकपि राजा। रामसिया का दिव्यरूप तव हृदय विराजा।  

रघुवर कृपा बरसती तुमपर सदा सर्वदा। छू न सके भक्तोंको संकट कष्टआपदा।। 

वीर जगद्गुरु नाथ संत गुणिजन के रक्षक। सन्तोंके हित आप कालके भी हो भक्षक। 

रामकृपा का मुझको देना परम भक्ति बल कीर्ति गानमें करूं समर्पित सारा'कौशल'। 

हो जातेहो प्रकट सत्य मनसे जब टेरा। लखन रामसिय सहित हृदयमें करो बसेरा।।

1.पवनतनय संकटहरन मंगलमूरति रूप। 

वज्रकाय हनुमन्तके दर्शन दिव्य अनूप।। दर्शन दिव्यअनूप सन्तजन के रखवारे। भानुतनय के मित्र राम सियके तुम प्यारे। कलुष मिटाओनाथ आप मेरे तन मनके। नमनकोटिशः स्वीकारो हेतनय पवन के

2.रामलखन सीतासहित हृदयबसहु सुरभूप।

पाप पंक से मुक्तिहो दर्शनदो शुभरूप।। दर्शनदो शुभ रूप राम सिया हृदय विराजैं। 

कपिनायक की कृपा होय अघ संकट भाजैं।।

शब्द पुष्पसे अर्पित बातें अपने मन की।जय जय बजरंग वीर, मातु सिया राम लखन की।।

*......वीर बजरंग बली की जय......*


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