पीछे खड़े दिखाँय।
स्वर्ग सम्पदा में रमे,
अन्तिम सुख वह पाँय ।।
रहा जो पीछे ठाढ़ा,
उसी ने झण्डा गाड़ा ।।
102.बढ़ी शक्ति संकल्प की,
उसको कहें स्वतन्त्र ।
खुली सोच जो ना रखे,
समझो है परतन्त्र ।।
गुलामी होती मन से,
बाद में तन चिन्तन से ।।
103.राम भूल धन को भजे,
डूबें इस संसार ।
मूढ़ मन्द उस जीव को,
पड़े कोटि धिक्कार ।।
काम हित राम भुलाया,
हाथ भी कुछ नहिं आया ।।
104.युद्धभूमि संसार है,
देती नित नव घाव ।
जीवन में उत्साह ही,
है स्थाई भाव ।।
जिन्दगी एक लड़ाई,
जीत विरलों ने पाई ।।
105.जो निर्धनता से हँसे,
सच्चा सुख वह पाय।
पड़ा रहे पाखण्ड में,
दुख में दिवस बिताय।।
गरीबी में मुस्काये,
स्वर्ग सुख वह ही पाए।।
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