यह संसार का नियम है कि व्यक्ति दूसरों को कसूरवार ठहराता है, परंतु अपने ऊपर कभी भी कोई कलंक नहीं लगने देता। इसीलिए अगली बार किसी की भी आलोचना करने से पहले सोच लें कि आलोचना तो बूमरैंग की भाँति लौटकर हमारे पास ही आती है, अर्थात् आलोचना करनेवाले को खुद अपनी ही आलोचना का सामना करना पड़ता है। हमें यह बात भी अपने दिमाग में रखनी चाहिए कि जिस आदमी की हम आलोचना कर रहे हैं या फिर जिसे सुधारने की हम कोशिश कर रहे हैं, वह उसके अंतर में या तो अपने पक्ष में कोई तर्क पेश करेगा या फिर शिष्ट व विनम्र शब्दों में कह देगा, “जो कुछ भी मैंने किया, उसके अलावा मेरे पास और कोई उपाय भी तो नहीं था।"
15 अप्रैल, सन् 1865 की सुबह अब्राहम लिंकन का पार्थिव शरीर एक सस्ते लॉजिंग हाउस के एक बड़े से कक्ष में रखा हुआ था। यह कमरा फोर्ड थिएटर के ठीक सामने था और यहीं पर जॉन विल्कीस बूथ ने लिंकन को गोलियों से छलनी कर दिया था । लिंकन का वह बिस्तर उनके हिसाब से काफी छोटा था। रोजा बॉन्हर की विख्यात पेंटिंग 'द हॉर्स फेयर' की सस्ती नकल उनके बिस्तर के ऊपर टँगी हुई थी और एक गैसलाइट पीली रोशनी फेंक रही थी। रक्षामंत्री स्टैटन ने लिंकन के पार्थिव शरीर के समक्ष खड़े होकर लोगों से कहा, “लोगों के हृदय पर राज करनेवाला संसार का सर्वश्रेष्ठ शासक अब हमें छोड़कर चला गया है!”
लिंकन में लोगों का दिल जीतने की ऐसी कौन सी कला थी? क्या रहस्य था उनकी कामयाबी का ? लिंकन लोगों के साथ कैसे बरताव करते थे? क्या वे दूसरों की निंदा नहीं करते थे? हाँ, बिल्कुल करते थे।
अपनी जवानी में इंडियाना की पिजियन क्रीक वैली में न सिर्फ लोगों की आलोचनाएँ करते थे, वरन् पत्रों तथा कविताओं के माध्यम से लोगों का उपहास करते हुए वे उन्हें प्रकाशित भी करवाते थे। एक ऐसे ही पत्र से एक बार नफरत की आग ऐसी भड़की कि वह जीवन भर जलती रही।
इलिनॉय में वकील के तौर पर प्रैक्टिस करते समय भी लिंकन खुलकर अपने विरोधियों पर आक्रमण करते हुए पत्र लिखते थे तथा उन्हें समाचार-पत्रों में प्रकाशित करवाते थे, लेकिन एक बार तो बात कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई थी।
सन् 1842 में लिंकन ने जेम्स शील्ड्स नाम के अहंकारी तथा चिड़चिड़े राजनेता पर एक व्यंग्य भेजा, जो स्प्रिंगफील्ड के समाचार-पत्र ‘स्प्रिंगफील्ड जर्नल' में छप गया। सारा शहर शील्ड्स का मजाक उड़ा रहा था। ऐसे में शील्ड्स तो क्रोध के मारे आगबबूला हो गया, फिर उसने पता लगा ही लिया कि यह पत्र लिंकन ने लिखा था । शील्ड्स घोड़े पर सवार होकर लिंकन के सामने गया तथा उसके सामने द्वंद्वयुद्ध का प्रस्ताव रख दिया। लिंकन द्वंद्वयुद्ध के पक्ष में नहीं थे, लेकिन अपना आत्मसम्मान बचाने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ा। उन्हें कई हथियारों के विकल्प दिए गए और बाँहें लंबी होने के कारण लिंकन ने तलवारबाजी को चुना। इसके लिए वेस्ट पॉइंट ग्रैजुएट से तलवारबाजी का प्रशिक्षण भी लिया। जिस दिन द्वंद्वयुद्ध होना था, उस दिन शील्ड्स और लिंकन का आमना-सामना मिसिसिपी नदी के तट पर हुआ। ऐसे में एक की मौत तो निश्चित थी, लेकिन आखिरी क्षणों में उनके मित्रों के बीच-बचाव के कारण द्वंद्वयुद्ध टल गया।
हालाँकि लिंकन के जीवन की यह सबसे दुःखद घटना थी, लेकिन इस घटना से उन्होंने एक सबक भी सीख लिया। इसके बाद उन्होंने कभी भी किसी को अपमानजनक पत्र नहीं लिखे। लोगों का मजाक उड़ाना छोड़ दिया, फिर तो उन्होंने अपने शब्दकोश में से आलोचना शब्द को ही निकाल फेंका। लिंकन ने गृहयुद्ध के समय पोटोमैक की सेना के लिए एक के बाद एक कई नए जनरल नियुक्त किए और हरेक जनरल मैक्लेलन, पोप, बर्नसाइड हुकर, मीड सभी ने इतनी बड़ी-बड़ी गलतियाँ कीं कि लिंकन हताश होकर फर्श पर इधर से उधर घूमते रहते थे। लेकिन लिंकन, जिनका हृदय दुर्भावनाओं से नहीं, बल्कि सद्भावनाओं से भरा-पूरा था, एकदम शांत रहे। किसी की भी आलोचना नहीं की। उनके प्रिय शब्द तो ये थे, “ किसी की भी आलोचना भूलकर भी मत करो। इससे आपको भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा।"
जब कभी भी लिंकन की पत्नी तथा दूसरे लोग दक्षिणी प्रांतों की निंदा करते थे, तो लिंकन यही कहते थे, “उनकी निंदा मत करो; उनके जैसे हालातों में हम भी वैसे ही होते।" लेकिन लिंकन के पास लोगों की आलोचना करने के सारे अवसर मौजूद थे। सिर्फ एक उदाहरण से आप यह बात समझ सकते हैं। गोटिसबर्ग का युद्ध जुलाई 1863 के पहले तीन दिनों में लड़ा गया था। 4 जुलाई की रात में ही जनरल 'ली' दक्षिण दिशा में पीछे हटने लगा था। अचानक ही तूफानी बादलों के कारण हुई तीव्र वर्षा से बाढ़ आ गई। जैसे ही 'ली' अपनी हारी हुई सेना के साथ पोटोमैक पहुँचा, तो उसने देखा कि सामने तो बाढ़ से उफनती हुई नदी है, जिसे पार करना असंभव है और उसके पीछे विजेता यूनियन आर्मी है। 'ली' चारों ओर से फँस चुका था, बचने का कोई रास्ता नहीं था। लिंकन भी यह समझ गए थे कि यह भगवान् की कृपा से मिला एक सुअवसर था। 'ली' की सेना को पराजित करने का सुनहरा मौका, जिससे युद्ध फौरन समाप्त हो सकता था। इसी आशा में लिंकन ने जनरल मीड को यह आदेश दिया कि वे युद्ध से संबंधित कोई बैठक न बुलाएँ, सीधे 'ली' की सेना पर हमला कर दें। लिंकन ने अपने आदेशों को टेलीग्राफ कर दिया तथा एक परिचायक को मीड के पास भेजकर फौरन काररवाई करने के लिए कहा।
लेकिन जनरल मीड ने लिंकन के आदेश के विरुद्ध काम किया। मना करने के बावजूद उसने सैन्य सभा की एक बैठक बुलाई। वह ‘ली’ पर हमला करने से झिझक रहा था और इस बात के लिए उसने बहाने बनाकर लिंकन को टेलीग्राफ कर दिया कि वह 'ली' पर हमला नहीं कर सकता, फिर बाढ़ का पानी भी उतर गया और 'ली' अपनी सेना के साथ सुरक्षित नदी पार कर गया । लिंकन का क्रोध सातवें आसमान पर था। लिंकन अपने बेटे के सामने चीख-चीखकर कह रहे थे, “हे भगवान्! इसका क्या मतलब है? दुश्मन पूरी तरह हमारे कब्जे में था । कितना सुनहरा अवसर था। हमें तो सिर्फ अपने हाथ फैलाकर उसे पकड़ना था और फिर भी हमने उसे नहीं पकड़ा। मेरी बात किसी ने नहीं मानी, हालात हमारे अनुकूल थे तथा ‘ली’ के प्रतिकूल। अगर मैं वहाँ होता, तो 'ली' हमारे शिकंजे में होता और मैं खुद उसे अपने हाथों से कोड़े मारता।”
याद रहे, अपनी जिंदगी के इस पड़ाव में लिंकन अत्यंत शील, संयत थे तथा उनकी भाषा बहुत संयमित एवं शिष्ट होती थी । अपार निराशा के बीच लिंकन ने मीड को यह पत्र लिखा। सन् 1863 में लिंकन द्वारा लिखा यह पत्र गंभीर आलोचना से भरा-पूरा था-
मेरे प्रिय जनरल,
मुझे लगता है कि आप 'ली' के बच निकलने को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । वह पूरी तरह हमारे जाल में था और उसको बंदी बना लेने से यह युद्ध समाप्त हो जाता, लेकिन अब तो युद्ध न जाने तब तक चलेगा? जब आप नदी के इस पार ही 'ली' पर हमला नहीं कर पाए, तो अब आप ऐसा कैसे कर पाएँगे? अब तो 'ली' नदी के उस पार सुरक्षित है और आप अपनी दो-तिहाई से अधिक सेना को तो नदी के उस पार नहीं ले जा सकते। यह बात तो एकदम तथ्यहीन है। मुझे नहीं लगता कि अब आप ज्यादा कुछ कर सकेंगे। मुझे इस बात का बहुत दुःख है कि हम सुनहरा अवसर गँवा चुके हैं और अब हम सिर्फ हाथ ही मल सकते हैं।
सोचिए, जनरल मीड को यह पत्र पढ़कर कैसा लगा होगा?
आश्चर्य, मीड को यह पत्र कभी मिला ही नहीं । कारण, लिंकन ने कभी इसे भेजा ही नहीं । यह पत्र तो लिंकन की मृत्यु के पश्चात् उनकी फाइलों के बीच पड़ा था ।
मुझे तो ऐसा लगता है कि लिंकन ने यह पत्र लिखने के बाद अपने कक्ष की खिड़की के बाहर झाँककर देखा होगा और फिर खुद से कहा होगा, ‘लिंकन, एक मिनट रुको' । संभवतः मैं कुछ अधिक ही उतावला हो रहा हूँ। मैं मीड को 'ली' पर आक्रमण करने की मंत्रणा इसलिए दे रहा हूँ, क्योंकि मैं व्हाइट हाउस के शांत वातावरण में जी रहा हूँ। मेरे लिए ऐसी मंत्रणा देना एकदम सरल है, लेकिन अगर मैंने भी गेटिसबर्ग में रहकर पिछले दिनों के दौरान हुए खून-खराबे को देखा होता, जैसा कि मीड ने देखा है, अगर मेरे कानों में भी मरनेवालों और घायलों की चीख- पुकारें गूँज रही होतीं, तो निश्चित रूप से मैं भी हमला करने के लिए इतना तत्पर कभी भी नहीं होता । यदि मेरी प्रवृत्ति भी मीड की तरह सुरक्षात्मक होती, तो मैंने भी वही किया होता, जैसा कि मीड ने किया था। यदि मैं इस पत्र को अब भेजता भी हूँ तो मेरे मन की भड़ास तो निकल जाएगी, पर मीड के दिल को बहुत चोट पहुँचेगी। वह भी मेरी निंदा करेगा और फिर खुद को सही साबित करने में समय गँवाएगा। इससे हम दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति दुर्भावना पैदा हो जाएगी और फिर एक सेनापति के रूप में मीड की छवि भी खराब हो जाएगी। हो सकता है कि मीड अपने पद से त्याग-पत्र ही दे दे।'
लिंकन ने उस पत्र को उठाकर एक तरफ रख दिया था। लिंकन का कटु अनुभव इस बात का गवाह था कि तीखी आलोचना सदैव ही व्यर्थ होती है और उससे किसी को भी फायदा नहीं होता ।
महान् लेखक मार्क ट्वेन कभी-कभी तो क्रोध में आकर पागल से हो जाते थे और फिर क्रोध से इतना विषैले पत्र लिखते थे कि पेपर तक हिल उठता था । उदाहरणत:, एक बार क्रोध में भरे मार्क ने एक आदमी को लिखा, “मेरा मन चाहता है कि तुम्हें जीवित दफन कर दिया जाए। अगर तुम भी ऐसा ही चाहते हो, तो मुझे बता दो, बाकी बंदोबस्त मैं खुद कर लूँगा ।" एक अन्य अवसर पर उन्होंने एक संपादक को पत्र लिखकर यह बताया कि उनका प्रूफरीडर ‘मेरी स्पेलिंग तथा विराम-चिह्न को सुधारने की कोशिश करता है। ट्वेन ने फौरन आदेश दिया, “आप अगली बार मेरे लिखे अनुसार ही छापें और प्रूफरीडर से कह दें कि वह अपने सुझावों को अपने घिसे-पिटे, सड़े हुए दिमाग में ही रहने दे।”
इसी तरह के विषैले पत्र लिखकर मार्क ट्वेन सुकून की साँस लेते थे। इससे उनके मन का सारा उफान बाहर आ जाता था और किसी को कोई नुकसान भी नहीं होता था, क्योंकि उनकी पत्नी इतनी समझदार थी कि चुपके से उन पत्रों को फाड़कर कूड़ेदान में फेंक देती थी। उन पत्रों ने कभी भी डाक के डिब्बे की शक्ल नहीं देखी थी। तो क्या आप किसी ऐसे आदमी को जानते हैं, जिसे आप परिवर्तित करना, सुधारना या फिर कुछ अच्छा बनाना चाहते हैं। बहुत से उत्कृष्ट विचार हैं। मैं भी इसका पक्षधर हूँ, लेकिन क्यों न इसका शुभारंभ खुद से ही कर लिया जाए। यदि स्वार्थहीन होकर सोचोगे, तो तुम सबसे पहले खुद को सुधारना चाहोगे । यह कोई खतरनाक खेल भी नहीं होगा । दार्शनिक कंफ्युशियस ने कहा भी था, “ अपने पड़ोसी की छत पर पड़ी बर्फ के बारे में शिकायत तब तक मत करो, जब तक कि आपके खुद के घर की सीढ़ियाँ साफ न हों। " अब यदि हममें से कोई भी किसी के लिए अपने मन में नफरत और द्वेष की मनोदशा पैदा कर लेता है, तो यह दशकों तक चलती रहती है और संभवतः उस आदमी की मौत के बाद भी यह समाप्त नहीं होती, तो इसके लिए हमें सिर्फ इतना करना चाहिए कि हम कुछ गिने-चुने शब्दों में उस आदमी की आलोचना कर दें, चाहे हमारी आलोचना तार्किक हो या अतार्किक ।
जब भी अन्य लोगों के साथ मेल-जोल बढ़ाएँ, उनके साथ व्यवहार करें, तो सदैव यह बात अपने दिमाग में रखनी चाहिए कि हमारा सामना सिर्फ तार्किक बुद्धिवाले लोगों के साथ नहीं होगा । हर आदमी में कुछ भावनात्मक गुण अवश्य होते हैं, कुछ खामियाँ भी जरूर होती हैं, गर्व भी होता है तो अहंकार भी जरूर होता है।
अंग्रेजी साहित्य के महान् उपन्यासकार थॉमस हार्डी ने कटु आलोचना के कारण ही तो उपन्यास लेखन से संन्यास ले लिया था।
अंग्रेज कवि थॉमस चैटरटन की आत्महत्या की वजह भी तो निंदा ही थी। अपनी जवानी में अति अशिष्ट रह चुके बेंजामिन फ्रैंकलिन आगे जाकर इतने कूटनीतिक बन गए, इतने व्यवहार कुशल बन गए कि उनको फ्रांस राजदूत के रूप में भेजा गया था। आखिर क्या था उनकी कामयाबी का रहस्य? उनका कथन था - " मैं किसी के भी विषय में खराब नहीं बोलूँगा, हर किसी के बारे में सिर्फ अच्छी बात ही बोलूँगा।"
तो बुराई करना, निंदा करना, शिकायत करना, आलोचना करना, ये सब करना बहुत आसान होता है। कोई बेवकूफ ही ऐसा कर सकता है या फिर यों कहें कि ज्यादातर बेवकूफ यही तो कहते हैं, लेकिन लोगों को समझने तथा उनको माफ करने के लिए आदमी को बहुत समझदारी तथा संयम की जरूरत होती है, कार्लाइल ने इसीलिए तो कहा था, “महान आदमी छोटे लोगों के साथ व्यवहार करने में अपनी महानता का परिचय देते हैं। "
एक प्रसिद्ध टेस्ट पायलट बॉब हूवर आमतौर पर 'एयर शो' में प्रदर्शन करते थे। एक बार वे सैन डिएगो से 'एयर शो' में भाग लेने के पश्चात् लॉस एंजिल्स में अपने घर की ओर लौट रहे थे। अचानक ही हवा में तीन सौ फीट की ऊँचाई पर दोनों इंजन बंद हो गए। कुशल तकनीक से उन्होंने हवाई जहाज को नीचे उतार लिया, लेकिन इससे किसी आदमी को चोट नहीं आई। हाँ, जहाज का तो काफी नुकसान हो गया। नीचे उतरने पर बॉब हूवर ने सबसे पहले हवाई जहाज के ईंधन की जाँच-पड़ताल की। वह यह देखकर चकित रह गए कि उनके दूसरे विश्वयुद्ध वाले प्रोपेलर जहाज में गैसोलीन के स्थान पर जेट का ईंधन डाल दिया गया था।
फिर उन्होंने उस मेकैनिक के बारे में पता लगाया, जिसने उनके हवाई जहाज की सर्विस की थी। वह एक युवा मेकैनिक था और खुद अपनी त्रुटि पर शर्म से पानी-पानी हो रहा था। जैसे ही हूवर उसके समीप पहुँचे, तो उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उनकी जरा सी बेपरवाही की वजह से तीन जिंदगियाँ भी जा सकती थीं और हवाई जहाज का तो काफी नुकसान हो ही चुका था।
सोचिए, उस समय उस मेकैनिक की शक्ल देखकर हूवर को कितना क्रोध आया होगा? उसे फटकार लगाने, यहाँ तक कि उसे मारने का भी मन किया होगा, लेकिन हूवर ने मेकैनिक को डाँट लगाना तो दूर, उसकी आलोचना तक नहीं की। इसके बजाय उन्होंने उससे कहा, “तुम्हें यह बताने के लिए कि मैं तुम पर कितना भरोसा करता हूँ तथा तुम दुबारा कभी ऐसा नहीं करोगे, मेरी इच्छा है कि कल तुम ही मेरे एफ-51 हवाई जहाज की सर्विसिंग करो।
अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों की आलोचनाएँ करते नहीं थकते। क्या आप सोच रहे हैं कि कोई आपको ऐसा करने से रोक रहा है? नहीं, ऐसा संभव भी नहीं है।यहां सिर्फ यह उल्लेखनीय है कि यदि आलोचक माता पिता पहले अमरीकी पत्रकारिता के एक प्रसिद्ध लेख 'फादर फॉरगेट्स' को अवश्य पढ़ लें। पहली बार यह लेख 'पीपुल होम जर्नल' के एक संपादकीय के रूप में प्रकाशित हुआ था । 'रीडर्स डाइजेस्ट' में इसका लघु रूपांतरण कुछ इस तरह प्रकाशित हुआ था—
“कुछ लेख गहन अनुभूति के किसी खास पल में लिखे जाते हैं और वह लेख पाठकों के दिल को छू जाते हैं। ऐसा ही एक लेख 'फादर फॉरगेट्स' भी है। अब यह लेख लगातार पुनः प्रकाशित हो रहा है। इसके लेखक डब्ल्यू लिविंगस्टोन लारनेड का कहना है कि यह लेख हजारों अखबारों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुका है। कई विदेशी भाषाओं में भी यह लेख उतना ही सफल हुआ है। मैंने हजारों लोगों को यह अनुमति दी है कि वे इसका उपयोग गिरिजाघर, विद्यालय तथा व्याख्यान मंच में कर सकें। यह अनेक बार असंख्य कार्यक्रमों में रेडियो पर प्रसारित हो चुका है। कॉलेज तथा उच्च विद्यालय की पत्रिकाओं में भी यह लेख छप चुका है। कई बार एक लघु लेख ही रहस्यमय कारणों से 'क्लिक' हो जाता है। इस लेख के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है।
फादर फॉरगेट्स (हरेक पिता यह याद रखे) — डब्ल्यू लिविंगस्टन लारनेड
“जरा सुनो बेटे! मैं तुमसे कुछ बातें करना चाहता हूँ। तुम तो गहरी नींद में सोये हुए हो। तुम्हारा प्यारा छोटा सा हाथ तुम्हारे कोमल गाल के नीचे दबा हुआ है। तुम्हारे पसीने में तर माथे पर घुँघराले बाल बिखरे हुए हैं। मैं अकेला हूँ और चुपचाप तुम्हारे कक्ष के भीतर आया हूँ। अभी कुछ मिनटों पहले मुझे बहुत पछतावा हुआ, जब मैं लाइब्रेरी में अखबार पढ़ रहा था। इसीलिए तो मैं आधी रात के समय किसी दोषी आदमी की तरह तुम्हारे बिस्तर के पास खड़ा हुआ हूँ । ये वे बातें हैं, जिनके बारे में मैं सोच रहा था— बेटे, आज मैंने तुम पर बहुत क्रोध किया था। जब तुम विद्यालय जाने के लिए तैयार हो रहे थे, तो मैंने तुम्हें खूब डाँट पिलाई थी। तुमने तौलिए की जगह परदे में हाथ पोंछ लिये थे। तुम्हारे गंदे जूते देखकर भी में तुम पर क्रोधित हुआ था। सारा फर्श तुम्हारे द्वारा बिखेरी गई चीजों से भरा पड़ा था, इसके लिए भी तुम्हें बहुत कोसा था। जब तुम नाश्ता कर रहे थे, तब भी मैंने तुम्हें भला-बुरा कहा था। कारण, तुमने खाने की मेज पर खाना बिखेर दिया था । खाते समय तुम्हारा मुँह खुला था और चपड़-चपड़ की आवाज आ रही थी।
" तुम्हारी कुहनियाँ मेज पर थीं। तुमने टोस्ट पर कुछ ज्यादा मक्खन लगा लिया था। सिर्फ इतना ही नहीं, मेरे दफ्तर जाते वक्त भी जब तुम खेलने जा रहे थे और तुमने मुझे 'गुड बाय डैडी' बोला था, तब भी मैंने तुम्हें गुस्से में टोक दिया था, 'जरा अपना कॉलर तो ठीककर लो। ' दफ्तर से लौटने पर भी मैंने देखा कि तुम अपने साथियों के साथ मिट्टी में खेल रहे थे। तुम्हारी जुराबों में छेद हो गए थे और तुम्हारे कपड़े बहुत गंदे थे। मैं अपने क्रोध पर काबू नहीं रख पाया और तुम्हारे साथियों के सामने ही तुम्हें अपमानित कर दिया था। ज्ञात है, जुराबें कितनी महँगी हो गई हैं, कपड़े कितने कीमती हैं। जब खुद अपनी कमाई से खरीदोगे, तब पता चलेगा। यही सब तो मैंने कहा था और एक पिता अपने बच्चे का इससे अधिक दिल किस तरह दुःखा सकता है?
“तुम्हें तो याद ही होगा कि रात को जब मैं लाइब्रेरी में पढ़ रहा था और तुम मेरे कक्ष में आए थे तो तुम कितने सहमे हुए और आतंकित थे। तुम्हारी आँखों में झलक रही थी, तुम्हारे सीने की चोट । तब भी मैंने अखबार के ऊपर से देखते हुए पढ़ने में रुकावट डालने के लिए तुम्हें बुरी तरह झिड़क दिया था, ‘कभी तो चैन से जीने दिया करो।' और तुम दरवाजे पर ही बुत बन गए थे।
“तुम कुछ भी बोले नहीं थे। मेरे पास भागकर आए थे और मेरे गले में अपनी बाँहें डाल दी थीं और मुझे प्यार किया था और फिर 'गुड नाइट डैडी' कहकर एकदम गायब हो गए थे, तुम्हारी नन्हीं बाँहों की पकड़ ऐसी मजबूत थी कि वह यह एहसास करा रही थीं कि इतनी उपेक्षा के बावजूद तुम्हारे मन-मंदिर में खिला प्रेम-रूपी पुष्प अभी तक मुरझाया नहीं है और फिर तुम सीढ़ियों पर जोर-जोर से खट-खट करके चढ़ गए थे। हाँ बेटे, इस घटना के कुछ क्षणों बाद ही मेरे हाथों से अखबार छूट गया और मैं आत्मग्लानि में डूब गया। आखिर मैं ऐसा क्यों होता जा रहा हूँ? मेरी आदत डाँटने-फटकारने की होती जा रही है। अपने बच्चे को मैं यह कैसा बचपन दे रहा हूँ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैंने तुम्हें प्यार करना छोड़ दिया है, लेकिन मुझे तुमसे कुछ अधिक ही आशाएँ हैं और मैं तुम्हारे बचपने को अपनी आयु के तराजू पर तौलने लगा हूँ ।
“तुम बहुत प्यारे, सच्चे और अच्छे हो। तुम्हारा नन्हा, मासूम सा हृदय तो चौड़ी पहाड़ियों के पीछे से उगती सुबह की भाँति विशाल है। तुम्हारे अंदर तो बहुत बड़प्पन है, तभी तो इतनी डाँट के बावजूद तुम मुझे 'गुड नाइट किस' देने आ गए थे। तुम में कोई मैल नहीं है, यह रात बस इसीलिए इतनी खास है मेरे बेटे ! मैं अँधेरे में तुम्हारे बिस्तर के सिरहाने घुटनों के बल बैठा हूँ, लज्जित, अपमानित, तुमसे बहुत छोटा ।
'यह तो सिर्फ एक दुर्बल पश्चात्ताप है। मुझे ज्ञात है कि अगर मैं अभी तुम्हें जगाकर यह बताऊँगा तो तुम कुछ भी नहीं समझोगे, लेकिन मैंने सोच लिया है, कल से मैं तुम्हें प्यारा पापा बनकर दिखाऊँगा । मैं तुम्हारे सुख-दुःख सब बाँटँगा । अगली बार तुम्हें डाँटने में पहले अपनी जीभ को अपने दाँतों के नीचे दबा लूँगा। यह मंत्र सदैव रटता रहूँगा, 'मेरा बेटा तो अभी बालक है, छोटा सा, प्यारा सा, नन्हा सा मासूम बालक।' अब मुझे अपनी इस सोच पर बहुत दुःख होता है कि मैं तुम्हें बहुत बड़ा मानने लगा था, लेकिन आज जब मैंने देखा कि तुम कैसे थके-थके मासूम से पलंग पर सो रहे हो, एकदम निश्चिंतता के साथ, तो बेटे, मुझे यह एहसास हो गया है कि तुम अभी छोटे से बच्चे ही तो हो। कल तक तुम अपनी माँ की बाँहों में झूलते थे, उसके कंधे पर सिर रखकर सो जाते थे। मैंने तुमसे कुछ ज्यादा ही उम्मीद बाँध ली थी, कुछ ज्यादा ही।"
तो इस लेख का भी यही सार निकला कि लोगों की आलोचना करने के बजाय हमें यह जानने, समझने की कोशिश करनी चाहिए कि जो काम वे करते हैं, उसके पीछे कारण क्या हैं? हालातों पर ध्यान देना बहुत रोचक व फायदेमंद सिद्ध होगा। इससे माहौल हल्का-फुल्का बना रहेगा। सबको समझ लेने का मतलब सबको माफ कर देना ही तो होता है।
अगर आप जो कर रहे हो, वह आपको पसंद नहीं है तो आपको कभी सफलता हासिल नहीं होगी।
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